Raj Bhasha

Rajbhasa Hindi

 

हिन्दी किसके लिए

आज “ स्वदेशी ”, “स्वाधीनता” , “स्वधर्म “और “स्वाध्याय” जैसे शब्द बहुत से लोगों को अप्रासंगिक या द्कियानूसी लगने लगे हैं और ये  शब्द  अपना अर्थ खोते जा रहे हैं । हिन्दी को लेकर बात करना उबाऊ कवायद होती जा रही है । अब बहुत से हिन्दी के हितैषी “हिन्दी दिवस “को  एक खाना पूर्ति से अधिक नहीं मानते । एक दिन हिन्दी की आरती उतारने के नाम पर कुछ वाद-विवाद और लेख की प्रतियोगिता , भाषण-प्रवचन और हिन्दी बोलने वाले विद्वानों का स्वागत करते हैं , सम्मान करते हैं,बड़े-बड़े बैनर लगाते हैं ,पार्टी करते हैं। जिसका परिणाम यह है कि हिन्दी की दशा अभी भी ज्यों की त्यों दयनीय बनी हुई । इसकी यह स्थिति तब है जब संबिधान की व्यवस्था हिन्दी के बारे में स्पष्ट है कि वही हमारी अपनी वैधानिक राजभाषा है और अंग्रेजी सह राजभाषा है  ।वास्तविकता इसके ठीक विपरीत है ।

भाई ! यह हिन्दी केवल एक भाषा ही नहीं है।यह कला ,संगीत ,और ज्ञान का भी मूर्तिमान रूप है ।यह एक संस्कृति और जीवन शैली की रक्षक भी है । यह एक धरोहर है जिसको एक किनारे रखकर हम, देश और समाज को भी सुरक्षित नहीं रख पाएंगे ।देश को एक बनाए रखने के लिए इसकी महती ज़्ररूरत है ।क्या हम चाहते हैं कि हमारी संस्कृति और अस्मिता का दिवाला पिट जाए ?हिन्दी को छोड़और उससे मुक्त होकर हम जीवन शक्ति खो बैठेंगे ।हम उन मूल्यों को ,विचारों को ,भुला देंगे  ,जिनसे हमारा अस्तित्व आकार लेता है । हिन्दी के बारे में सोचते हुए हमें इस सामाजिक और सांस्कृतिक्विस्मरण और अस्मिता के लोप के खतरों पर भी ध्यान देना होगा । हिन्दी की शक्ति का स्रोत हिन्दी की रागात्मक,बौद्धिक AaOr आध्यात्मिक संपदा में है ।

राष्ट्र भाषा हिन्दी

भारतीय संविधान की धारा ३४३  में यह घोषणा की गई है कि “देवनागरी लिपि में हिन्दी भारत की राजकीय भाषा होगी ।यह भी कहा गया किसंघ सरकार का यह कर्तव्य है कि हिन्दी के प्रचार का प्रयत्न करे । १४ सितंबर १९४९ को संविधान सभा द्वारा हिन्दी को राज भाषा के रूप में मान्यता दी गई।हिन्दी भाषा और देवनागरी लिपि के प्रयोग एवं प्रसार हेतु निरंतर प्रयत्नशील रहना ,हमारा प्रथम दायित्व है ।हमारा लक्ष्य है :-  हिन्दी सरकार केकामकाज के साथ-साथ जन-जन के व्यवहार की भाषा बने ।